25 August 2016

सृजनशील जीवन की सीख देते कृष्ण

चित्र - आनन्द सिंह कविया जी फेसबुक वॉल से 
भगवान् कृष्ण का जीवन जितना रोचक है उतना ही मानवीय और मर्यादित । इसीलिए आम इंसान को बहुत कुछ सिखाता समझाता है  नंदगांव के कन्हैया से लेकर अर्जुन के पार्थ तक उनका चरित्र  जीवन जीने के अर्थपूर्ण संदेश संजोये हुए है | जो हर तरह से मानव कल्याण और जन सरोकार के भाव लिए हैं | बालपन से लेकर कुटुम्बीय जीवन तकउनकी हर बात में जीवन सूत्र छुपे हैं। तभी तो सामाजिक, धार्मिक,दार्शनिक और राजनीतिक हर क्षेत्र में सारथी  की भूमिका में सच्चे हितेषी कहे जाते हैं कृष्ण । 

इंसान के  विचार और व्यवहार स्वयं उनके ही नहीं बल्कि  राष्ट्र और समाज की भी दिशा तय करते हैं । कृष्ण के सन्देश  इन दोनों पक्षों के परिष्करण पर बल देते हैं । एक ऐसी जीवनशैली सुझाते हैं जो सार्थकता और संतुलन लिए हो । समस्याओं से जूझने की ललक लिए हो । गीता में वर्णित उनके सन्देश जीवन रण में अटल विश्वास के साथ खड़े रहने की सीख देते हैं । महान दार्शनिक श्री अरविंदो ने कहा कि भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ व एक किताब न होकर एक जीवनशैली हैजो हर उम्र को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है। दुनिया के जाने माने  वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी कहा है कि 'श्रीकृष्ण के उपदेश अतुलनीय  हैं । '   कृष्ण से जुड़ी हर बात हमें जीवन के प्रति जागृत होने का सन्देश देती है मानव मन और जीवन के कुशल अध्येता कृष्ण यह कितनी सरलता और सहजता से बताते हैं कि जीवन जीना भी एक कला है |उनके चरित्र को जितना जानो उतना ही यह महसूस होता है कि इस धरा पर प्रेम का शाश्वत भाव वही हो सकता है जो कृष्ण ने जिया है यानि कि सम्पूर्ण प्रकृति से प्रेम यही अलौकिक प्रेम हम सबको  को आत्मीय सुख दे सकता है और इसी में समाई है  जनकल्याणकारी चेतना भी  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी कहा है कि जब मुझे कोई परेशानी घेर लेती हैमैं गीता के पन्नों को पलटता हूं।हम सब जानते हैं कि बापू भी  मानवीय सोच और जनकल्याण के पैरोकर रहे हैं । कृष्ण का जीवन प्रकृति के बहुत करीब रहा प्रकृति के लिए उनके मन में जो अपनत्व रहा वो समाज और राष्ट्र के सरोकारों से भी जोड़ने वाला है ।  कदम्ब का पेड़ और यमुना का किनारा उनके लिए बहुत विशेष स्थान रखते थे प्रकृति का साथ ही उनके   विलक्षण चरित्र को आनन्द और उल्लास का प्रतीक बनाता है शायद यह भी  एक कारण है कि कान्हा का नाम लेने से ही मन में  उल्लास और उमंग छा जाती है। उन्होनें कष्ट में भी चेहरे पर मुस्कुराहट और बातों में धैर्य की मिठास को बनाये रखा। कोई अपना रूठ जाए तो मनुहार कैसे करनी है ?  किस युक्ति से अपनों को मनाया जाता है यह तो स्वयं कृष्ण के चरित्र से ही सीखना चाहिए। वसुधैव कुटम्बकम के भाव को वासुदेव कृष्ण ने जिया है। मनुष्यों और मूक पशुओं से ही नहीं मोरपंख और बांसुरी से भी उन्होनें मन से प्रेम किया। कई बार तो ऐसा लगता मानो कृष्ण ने किसी वस्तु को भी जड़ नहीं समझा। तभी तो आत्मीय स्तर का लगाव रहा उन्हें हर उस वस्तु से भी जो उस परिवेश का हिस्सा थी जहाँ वे रहे |  वैसे भी  पेड़  पौधे हों या जीव जन्तु सम्पूर्ण प्रकृति की चेतना से जुड़ना ही सच्ची मानवता है। कान्हा का गायों की सेवा और पक्षियों से प्रेम यह बताता है कि जीवन प्रकृति से ही जन्म लेता है और मां प्रकृति ही इसे विकसित करती हैपोषित करती है।  सच में कभी कभी लगता है कि हम सबमें इस चेतन तत्व का विकास होगा तभी तो आत्मतत्व जागृत हो पायेगा। प्रकृति से जुड़ा सरोकार का ये भाव मानवीय सोच को साकार करने वाला है । यही वजह है कि   विचारव्यवहार और अपनत्व का यह भाव आज के जद्दोज़हद भरे जीवन में सबसे ज़रूरी है ।

कर्म के समर्थक कृष्ण सही अर्थों में जीवन गुरु है। क्योंकि हमारे कर्म ही जीवन की देश और दिशा तय करते हैं ।  कर्म की प्रधानता उनके संदेशों में सबसे ऊपर है । यही वजह कई वे ईश्वरीय रूप में भी आम इंसानों से जुड़े से दीखते हैं । मनुष्यों  ही नहीं संसार के समस्त  प्राणियों के लिए उनका एकात्मभाव देखते ही बनता है।  सच भी है कि आज के दौर में  भी नागरिक ही किसी देश की नींव सुदृढ़ करते हैं ।  वहां बसने वाले लोगों की  वैचारिक पृष्ठभूमि  और व्यवहार यह तय करते हैं कि उस देश का भविष्य कैसा होगा ?  मानवीय व्यवहार और संस्कार की शालीनता बताती है कि वहां जनकल्याण को लेकर कैसे भाव हैं । अधिकतर समस्याओं का हल  देश के  नागरिकों  के विचार और व्यवहार पर ही निर्भर है । ऐसे में कृष्ण कर्मशील होने का सन्देश  सृजन की राह सुझाता है । संकल्प की शक्ति देता है । कर्मठता का भाव पोषित  करता है । यही शक्ति हर नागरिक के लिए  अधिकारों सही समझ और कर्तव्य निर्वहन के दायित्व की सोच की  पृष्ठभूमि बनती है ।कृष्ण  की दूरदर्शी सोच समस्या नहीं बल्कि समाधान ढूँढने की बात करती है । जो कि राष्ट्रीय और  सामाजिक समस्याओं के सन्दर्भ में भी लागू होती है । तभी तो  भाग्य की बजाय कर्म करने पर विश्वास  करने सीख देने वाला मुरली मनोहर का दर्शन आज के दौर में सबसे अधिक प्रासंगिकता रखता है । कर्ममय जीवन के समर्थक कृष्ण जीवन को एक संघर्षों से भरा मार्ग ही समझते हैं । हम  मानवीय मनोविज्ञान के आधार पर समझने की कोशिश करें तो पाते हैं कि अकर्मण्यता जीवन को दिशाहीन करने वाला बड़ा कारक है ।यही बाते बताती हैं कि  कृ ष्ण का जीवन हर तरह से एक आम इंसान का जीवन लगता है। तभी तो किसी आम मनुष्य के समान भी वे दुर्जनों के लिए कठोर रहे तो सज्जनों के लिए कोमल ह्दय।  उनका यह व्यवहार भी तो प्रकृति से प्रेरित ही लगता है और कर्म की सार्थकता लिए है । 
आप  सभी  जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं | 

http://www.nationalistonline.com/2016/08/25/krishna-thoughts-give-direction-in-lifes-all-aspects/
नेशनलिस्ट ऑनलाइन  और  सन्मार्ग में प्रकाशित 


03 August 2016

गृहस्थी की धुरी पर संघर्षधर्मा स्त्री का दस्‍तावेज

अपने स्तरीय लेखन और शोधात्मक आलेखों के लिए मुक्कम्मल पहचान रखने वाले श्रीकृष्ण 'जुगनू' जी का मेरी किताब पढ़ना ही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है | हाल ही मेंउनकी लिखी समीक्षात्मक टिप्पणी अंतराष्ट्रीय ई पत्रिका 'हिंदी की गूज' में प्रकाशित हुई है । किताब पढ़कर अपने विचारों को उन्होंने जो शीर्षक दिया वो बहुत सारगर्भित है ,"गृहस्थी की धुरी पर संघर्षधर्मा स्त्री का दस्तावेज़"


शताधिक मौलिक और संपादित ग्रंथों से जुड़े श्रीकृष्णजी इंडोलोजिकल अध्ययन के लिए एक चर्चित नाम हैं | देश-विदेश में उनके काम की चर्चा होती रही है | उनका शोधकार्य लोक साहित्य से प्रमुखता से जुड़ा है | अब तक उनके हजारों शोध आलेख प्रकाशित हो चुके हैं | जिनसे इतिहास, पुरातत्व,संस्कृत, चित्रकला शिक्षा, भाषा-लिपि और संगीत आदि क्षेत्रों को सहयोग मिलता रहा है | अनेक स्तरीय सम्मानों से नवाजे जा चुके 'जुगनू' जी के लेख सभ्यता और संस्कृति के जाने कितने ही उन पक्षों को समाहित किये हैं, जिन्हें सहेजना और समझना आवश्यक है | आप जैसे गुणीजनों से मार्गदर्शन और प्रतिक्रिया मिलना सुखद है | आभार आपका Shri Krishan Jugnu जी |



प्रकाशन जगत में अपनी त्‍वरा टिप्‍पणियों और शोध-विचारित आलेखों के लिए जानी जाती हैं डॉ. मोनिका शर्मा। खूब लिखती हैं और खूब विचार जगाती है मगर वह कविता में भी सोचती है, यह नई बात है। उनका काव्‍य संग्रह आया है : देहरी के अक्षांश पर। अक्ष का अंश अक्षांश होता है और जब कवयित्री देहरी को लेकर सोचती है तो यह विचार  स्वाभाविक  है कि वह निश्चित ही देहरी पर केंद्रीभूत होकर कुछ कहने को आतुर है। कवयित्री का विचार है कि देहरी के भीतर और बाहर अपने परिवेश में जो देखा-जिया, वही अनुभूति मेरी कविताओं का केंद्र है।  गृहस्थी  की धुरी पर एक साधारण स्त्री  की असाधारण भूमिका को प्रतिबिम्बित करती है मेरी कविताएं। यह एक प्रयास है अविराम गतिशील गृहिणी की दिनचर्या में झांकने का। इसी अर्थ में  काव्य संग्रह '  गृहस्थी  की धुरी पर सतत् संघर्षरत मां को समर्पित' को किया गया है।

कवयित्री अपनी धुरी का अर्थ महज चार पंक्ति में देती है और लगता है कि ये परिभाषा वही है जो पाठक का मन देना चाहता है : धर-परिवार की / धुरी वह / फिर भी / अधूरी वह। (पृष्‍ठ 19) समाज में फिरकनी  शब्द  उसी फिरकी का पर्याय है जिसकी तासीर घूमना है। इसी बिंब को  स्वीकार  कर लिखा गया है : रिश्‍तों की बुनकर सी / वह साधे रहती है ताने बाने को / उलझने नहीं देती कोई डोर / भीतर और बाहर / हर ऊंच-नीच को समतल करने में / जुटी गृहिणी  को / निरुत्‍तर कर जाता है / ये  प्रश्न / कि दिन भर घर में करती क्या  हो। (पृष्‍ठ 21) यह बड़ा सच है कि घर के संचालन में केंद्रीभूत होकर भी नारी अकसर इस प्रश्न  से दो-दो हाथ हाेती है। उसकी संवेदना इन पंक्तियों में भी दृढ़रूप हुई है : गृहिणी  / जीवन के झंझावातों / और मन के मौसमी  उत्पातों  को भुला / कभी अलसाई भोर / और अंधेरे का लिहाफ़ ओढ़ती सांझ के / सिंदूरी क्षितिज को / ख़ामोश बैठ निहारना चाहती है पर- /  ज़िम्मेदारियों  के संग / लुका-छिपी खेलने का नहीं है / कोई रिवाज़... देहरी के भीतर। (सिंदूरी क्षितिज, पृष्‍ठ 23)

कवयित्री ने अपने मन की बात को कृति के ओर-छोर सर्वत्र कहने का प्रयास किया है। वह स्त्री  की छवि के मायने इन  शब्दों में उठाती है : एक तयशुदा भूमिका को / रेखांकित कर गढ़ी जाती है / स्‍त्री की छवि / कि वह ढल सके हर सांचे में / अपनी आशाओं और उपेक्षाओं के अनुरूप / और समयानुसार  स्वीकार  कर ले / हर नियम अर प्रतिबंध। (पृष्‍ठ 56) जो हकीकत से भी रूबरू करवाता है ।

एक बात और है जो स्‍त्री जीवन का एक  उज्जवल  पक्ष है : स्‍त्री हर रूप में आलोकित / करती है आंगन को / सजाती है दीप मालाएं / बिखेर देती है प्रकाश / छत मुंडेरों पर / और दमक उठता है सबका जीवन / मां के हाथों / प्रकाशित हुआ दीपक / देता है अंधकार में / सजग हो चलने की सीख / जिसकी लौ की उजास से / विस्‍तार पाती है हमारे / जीवन पथ पर फैली रोशनी। (उनसे जीवन में आलोक, पृष्‍ठ 59) किंतु वह यह भी  स्वीकारती  हैं : एक स्त्री  का अस्तित्‍व / समेटे रहता है / प्रकृति का पावन / गतिशीलता की जीवंत छटा / सहेजे रहता है पृथ्‍वी की / अचल, अदृश्‍य गहराई / और ओढ़े रहता है /  व्योम  का असीमित  विस्तार  / इनसे पृथक / इस सृष्टि में और है ही  क्या । (पृष्‍ठ 58)

कलम के संचालन की दक्ष मोनिका ने अपनी बातों को जिस प्रवाह के साथ लिखा है, उसे पढ़कर लगता है कि सधे सोच की सीधी-सपाट रेखाओं के रूप में इन कविताओं का सर्जन हुआ है। इसी के बरक्‍स फ्लैप पर अपने  वक्तव्य  में श्री नंद भारद्वाज ने लिखा है : कविताएं अपने पहले ही पाठ में सहृदय पाठक को अपने साथ बहा ले जाने की अनूठी क्षमता रखती है, अपने समय और समाज को लेकर कितना कुछ विलक्षण और विचारणीय कहने की समझ और सलीका है उनके पास।

सचमुच यह संग्रह गद्य का हुनर रखने वाली कलमकार के विचार का सुंदर वातायन है। यह समाज को एक विचार देने वाला है, नारी मन के कई भाव-अभाव भरे कलशों को छलकाता है और बहा ले जाता है पाठकों के मन को। गृहस्थी की धुरी पर अनगिनत दायित्वों को जीती स्त्री को लेकर ज़्यादा बात नहीं होती पर  उसका होना घर के हर सदस्य के जीवन को सम्बल देता है । सरल बनाता है । इसी अनकही  भावभूमि को लेकर उकेरी गयी ये कवितायें स्त्री मन की पीड़ा से गहरा परिचय करवाती हैं ।